श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.54

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्‍चेत्

किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।

ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां

क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः॥ ५४

grahā nimittaṃ sukhaduḥkhayoścet

kimātmano'jasya janasya te vai|

grahairgrahasyaiva vadanti pīḍāṃ

krudhyeta kasmai puruṣastato'nyaḥ|| 54

अर्थ

यदि ग्रहोंको सुख-दुःखका निमित्त मानें, तो उनसे भी अजन्मा आत्माकी क्या हानि? उनका प्रभाव भी जन्म-मृत्युशील शरीरपर ही होता है। ग्रहोंकी पीड़ा तो उनका प्रभाव ग्रहण करनेवाले शरीरको ही होती है और आत्मा उन ग्रहों और शरीरोंसे सर्वथा परे है। तब भला वह किसपर क्रोध करे?॥ ५४॥

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