श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.55

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्

किमात्मनस्तद्धि जडाजडत्वे।

देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्णः

क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम्॥ ५५

karmāstu hetuḥ sukhaduḥkhayoścet

kimātmanastaddhi jaḍājaḍatve|

dehastvacit puruṣo'yaṃ suparṇaḥ

krudhyeta kasmai na hi karmamūlam|| 55

अर्थ

यदि कर्मोंको ही सुख-दुःखका कारण मानें, तो उनसे आत्माका क्या प्रयोजन? क्योंकि वे तो एक पदार्थके जड और चेतन—उभयरूप होनेपर ही हो सकते हैं। (जो वस्तु विकारयुक्त और अपना हिताहित जाननेवाली होती है, उसीसे कर्म हो सकते हैं; अतः वह विकारयुक्त होनेके कारण जड होनी चाहिये और हिताहितका ज्ञान रखनेके कारण चेतन।) किन्तु देह तो अचेतन है और उसमें पक्षीरूपसे रहनेवाला आत्मा सर्वथा निर्विकार और साक्षीमात्र है। इस प्रकार कर्मोंका तो कोई आधार ही सिद्ध नहीं होता। फिर क्रोध किसपर करें?॥ ५५॥

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