श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.24.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्‍वरे।

शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः॥ २५

yonirvaikārike saumya līyate manasīśvare|

śabdo bhūtādimapyeti bhūtādirmahati prabhuḥ|| 25

अर्थ

हे सौम्य! राजस अहंकार अपने नियन्ता सात्त्विक अहंकाररूप मनमें, शब्दतन्मात्रा पंचभूतोंके कारण तामस अहंकारमें और सारे जगत‍्को मोहित करनेमें समर्थ त्रिविध अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ २५॥

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