हे सौम्य! राजस अहंकार अपने नियन्ता सात्त्विक अहंकाररूप मनमें, शब्दतन्मात्रा पंचभूतोंके कारण तामस अहंकारमें और सारे जगत्को मोहित करनेमें समर्थ त्रिविध अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ २५॥
योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्वरे।
शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः॥ २५
हे सौम्य! राजस अहंकार अपने नियन्ता सात्त्विक अहंकाररूप मनमें, शब्दतन्मात्रा पंचभूतोंके कारण तामस अहंकारमें और सारे जगत्को मोहित करनेमें समर्थ त्रिविध अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.24.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 866) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/24/25/