॥ श्रीहरिः ॥
तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः।
मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन च॥ ५
tamo rajaḥ sattvamiti prakṛterabhavan guṇāḥ|
mayā prakṣobhyamāṇāyāḥ puruṣānumatena ca|| 5
अर्थ
उद्धवजी! मैंने ही जीवोंके शुभ-अशुभ कर्मोंके अनुसार प्रकृतिको क्षुब्ध किया। तब उससे सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण प्रकट हुए॥ ५॥
तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः।
मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन च॥ ५
उद्धवजी! मैंने ही जीवोंके शुभ-अशुभ कर्मोंके अनुसार प्रकृतिको क्षुब्ध किया। तब उससे सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण प्रकट हुए॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.24.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 864) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/24/5/