श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः।

देहेऽभयं मनोऽसंगं तत् सत्त्वं विद्धि मत्पदम्॥ १६

yadā cittaṃ prasīdeta indriyāṇāṃ ca nirvṛtiḥ|

dehe'bhayaṃ mano'saṃgaṃ tat sattvaṃ viddhi matpadam|| 16

अर्थ

जब चित्त प्रसन्‍न हो, इन्द्रियाँ शान्त हों, देह निर्भय हो और मनमें आसक्ति न हो, तब सत्त्वगुणकी वृद्धि समझनी चाहिये। सत्त्वगुण मेरी प्राप्तिका साधन है॥ १६॥

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