॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.25.16
यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः।
देहेऽभयं मनोऽसंगं तत् सत्त्वं विद्धि मत्पदम्॥ १६
yadā cittaṃ prasīdeta indriyāṇāṃ ca nirvṛtiḥ|
dehe'bhayaṃ mano'saṃgaṃ tat sattvaṃ viddhi matpadam|| 16
अर्थ
जब चित्त प्रसन्न हो, इन्द्रियाँ शान्त हों, देह निर्भय हो और मनमें आसक्ति न हो, तब सत्त्वगुणकी वृद्धि समझनी चाहिये। सत्त्वगुण मेरी प्राप्तिका साधन है॥ १६॥