श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम्।

मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय॥ १८

sīdaccittaṃ vilīyeta cetaso grahaṇe'kṣamam|

mano naṣṭaṃ tamo glānistamastadupadhāraya|| 18

अर्थ

जब चित्त ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि विषयोंको ठीक-ठीक समझनेमें असमर्थ हो जाय और खिन्‍न होकर लीन होने लगे, मन सूना-सा हो जाय तथा अज्ञान और विषादकी वृद्धि हो, तब समझना चाहिये कि तमोगुण वृद्धिपर है॥ १८॥

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