श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी।

तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा॥ २७

sāttvikyādhyātmikī śraddhā karmaśraddhā tu rājasī|

tāmasyadharme yā śraddhā matsevāyāṃ tu nirguṇā|| 27

अर्थ

आत्मज्ञानविषयक श्रद्धा सात्त्विक श्रद्धा है, कर्मविषयक श्रद्धा राजस है और जो श्रद्धा अधर्ममें होती है, वह तामस है तथा मेरी सेवामें जो श्रद्धा है, वह निर्गुण श्रद्धा है॥ २७॥

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