श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः।

दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ॥ ३१

sarve guṇamayā bhāvāḥ puruṣāvyaktadhiṣṭhitāḥ|

dṛṣṭaṃ śrutamanudhyātaṃ buddhyā vā puruṣarṣabha|| 31

अर्थ

नररत्‍न! पुरुष और प्रकृतिके आश्रित जितने भी भाव हैं, सभी गुणमय हैं—वे चाहे नेत्रादि इन्द्रियोंसे अनुभव किये हुए हों, शास्त्रोंके द्वारा लोक-लोकान्तरोंके सम्बन्धमें सुने गये हों अथवा बुद्धिके द्वारा सोचे-विचारे गये हों॥ ३१॥

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