॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.25.31
सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः।
दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ॥ ३१
sarve guṇamayā bhāvāḥ puruṣāvyaktadhiṣṭhitāḥ|
dṛṣṭaṃ śrutamanudhyātaṃ buddhyā vā puruṣarṣabha|| 31
अर्थ
नररत्न! पुरुष और प्रकृतिके आश्रित जितने भी भाव हैं, सभी गुणमय हैं—वे चाहे नेत्रादि इन्द्रियोंसे अनुभव किये हुए हों, शास्त्रोंके द्वारा लोक-लोकान्तरोंके सम्बन्धमें सुने गये हों अथवा बुद्धिके द्वारा सोचे-विचारे गये हों॥ ३१॥