मुझे अपनी ही हानि-लाभका पता नहीं, फिर भी अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानता हूँ। मुझ मूर्खको धिक्कार है! हाय! हाय! मैं चक्रवर्ती सम्राट् होकर भी गधे और बैलकी तरह स्त्रीके फंदेमें फँस गया॥ १३॥
स्वार्थस्याकोविदं धिङ् मां मूर्खं पण्डितमानिनम्।
योऽहमीश्वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जितः॥ १३
मुझे अपनी ही हानि-लाभका पता नहीं, फिर भी अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानता हूँ। मुझ मूर्खको धिक्कार है! हाय! हाय! मैं चक्रवर्ती सम्राट् होकर भी गधे और बैलकी तरह स्त्रीके फंदेमें फँस गया॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 872) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/26/13/