श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

स्वार्थस्याकोविदं धिङ् मां मूर्खं पण्डितमानिनम्।

योऽहमीश्‍वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जितः॥ १३

svārthasyākovidaṃ dhiṅ māṃ mūrkhaṃ paṇḍitamāninam|

yo'hamīśvaratāṃ prāpya strībhirgokharavajjitaḥ|| 13

अर्थ

मुझे अपनी ही हानि-लाभका पता नहीं, फिर भी अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानता हूँ। मुझ मूर्खको धिक्कार है! हाय! हाय! मैं चक्रवर्ती सम्राट् होकर भी गधे और बैलकी तरह स्त्रीके फंदेमें फँस गया॥ १३॥

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