॥ श्रीहरिः ॥
सेवतो वर्षपूगान् मे उर्वश्या अधरासवम्।
न तृप्यत्यात्मभूः कामो वह्निराहुतिभिर्यथा॥ १४
sevato varṣapūgān me urvaśyā adharāsavam|
na tṛpyatyātmabhūḥ kāmo vahnirāhutibhiryathā|| 14
अर्थ
मैं वर्षोंतक उर्वशीके होठोंकी मादक मदिरा पीता रहा, पर मेरी कामवासना तृप्त न हुई। सच है, कहीं आहुतियोंसे अग्निकी तृप्ति हुई है॥ १४॥
सेवतो वर्षपूगान् मे उर्वश्या अधरासवम्।
न तृप्यत्यात्मभूः कामो वह्निराहुतिभिर्यथा॥ १४
मैं वर्षोंतक उर्वशीके होठोंकी मादक मदिरा पीता रहा, पर मेरी कामवासना तृप्त न हुई। सच है, कहीं आहुतियोंसे अग्निकी तृप्ति हुई है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 872) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/26/14/