श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

सूर्ये चाभ्यर्हणं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभिः।

श्रद्धयोपाहृतं प्रेष्ठं भक्तेन मम वार्यपि॥ १७

sūrye cābhyarhaṇaṃ preṣṭhaṃ salile salilādibhiḥ|

śraddhayopāhṛtaṃ preṣṭhaṃ bhaktena mama vāryapi|| 17

अर्थ

सूर्यको प्रतीक मानकर की जानेवाली उपासनामें मुख्यतः अर्घ्यदान एवं उपस्थान ही प्रिय है और जलमें तर्पण आदिसे मेरी उपासना करनी चाहिये। जब मुझे कोई भक्त हार्दिक श्रद्धासे जल भी चढ़ाता है, तब मैं उसे बड़े प्रेमसे स्वीकार करता हूँ॥ १७॥

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