॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.27.18
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते।
गन्धो धूपः सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुनः॥ १८
bhūryapyabhaktopahṛtaṃ na me toṣāya kalpate|
gandho dhūpaḥ sumanaso dīpo'nnādyaṃ ca kiṃ punaḥ|| 18
अर्थ
यदि कोई अभक्त मुझे बहुत-सी सामग्री निवेदन करे तो भी मैं उससे सन्तुष्ट नहीं होता। जब मैं भक्ति-श्रद्धापूर्वक समर्पित जलसे ही प्रसन्न हो जाता हूँ, तब गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि वस्तुओंके समर्पणसे तो कहना ही क्या है॥ १८॥