श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

शुचिः सम्भृतसम्भारः प्राग्दर्भैः क ल्पितासनः।

आसीनः प्रागुदग् वार्चेदर्चायामथ सम्मुखः॥ १९

śuciḥ sambhṛtasambhāraḥ prāgdarbhaiḥ ka lpitāsanaḥ|

āsīnaḥ prāgudag vārcedarcāyāmatha sammukhaḥ|| 19

अर्थ

उपासक पहले पूजाकी सामग्री इकट्ठी कर ले। फिर इस प्रकार कुश बिछाये कि उनके अगले भाग पूर्वकी ओर रहें। तदनन्तर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके पवित्रतासे उन कुशोंके आसनपर बैठ जाय। यदि प्रतिमा अचल हो तो उसके सामने ही बैठना चाहिये। इसके बाद पूजाकार्य प्रारम्भ करे॥ १९॥✎ 1766 1767

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1766 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जीव-कलाका → जीवकलाका
  • #1767 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्राण-वायु → प्राणवायु

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