श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शंखचक्रगदाम्बुजैः।

लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्मकिंजल्कवाससम्॥ ३८

taptajāmbūnadaprakhyaṃ śaṃkhacakragadāmbujaiḥ|

lasaccaturbhujaṃ śāntaṃ padmakiṃjalkavāsasam|| 38

अर्थ

‘मेरी मूर्ति तपाये हुए सोनेके समान दम-दम दमक रही है। रोम-रोमसे शान्तिकी वर्षा हो रही है। लंबी और विशाल चार भुजाएँ शोभायमान हैं। उनमें शंख, चक्र, गदा, पद्म विराजमान हैं। कमलकी केसरके समान पीला-पीला वस्त्र फहरा रहा है॥ ३८॥

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