श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.39

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवरांगदम् ।

श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम्॥ ३९

sphuratkirīṭakaṭakakaṭisūtravarāṃgadam |

śrīvatsavakṣasaṃ bhrājatkaustubhaṃ vanamālinam|| 39

अर्थ

सिरपर मुकुट, कलाइयोंमें कंगन, कमरमें करधनी और बाँहोंमें बाजूबंद झिलमिला रहे हैं। वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न है। गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही है। घुटनोंतक वनमाला लटक रही है’॥ ३९॥

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