सिरपर मुकुट, कलाइयोंमें कंगन, कमरमें करधनी और बाँहोंमें बाजूबंद झिलमिला रहे हैं। वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न है। गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही है। घुटनोंतक वनमाला लटक रही है’॥ ३९॥
स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवरांगदम् ।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम्॥ ३९
सिरपर मुकुट, कलाइयोंमें कंगन, कमरमें करधनी और बाँहोंमें बाजूबंद झिलमिला रहे हैं। वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न है। गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही है। घुटनोंतक वनमाला लटक रही है’॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 880) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/27/39/