श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

ध्यायन्‍नभ्यर्च्य दारूणि हविषाभिघृतानि च।

प्रास्याज्यभागावाघारौ दत्त्वा चाज्यप्लुतं हविः॥ ४०

dhyāyannabhyarcya dārūṇi haviṣābhighṛtāni ca|

prāsyājyabhāgāvāghārau dattvā cājyaplutaṃ haviḥ|| 40

अर्थ

अग्‍निमें मेरी इस मूर्तिका ध्यान करके पूजा करनी चाहिये। इसके बाद सूखी समिधाओंको घृतमें डुबोकर आहुति दे और आज्यभाग और आघार नामक दो-दो आहुतियोंसे और भी हवन करे। तदनन्तर घीसे भिगोकर अन्य हवन-सामग्रियोंसे आहुति दे॥ ४०॥

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