श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

स्तवैरुच्चावचैः स्तोत्रैः पौराणैः प्राकृतैरपि।

स्तुत्वा प्रसीद भगवन्‍निति वन्देत दण्डवत्॥ ४५

stavairuccāvacaiḥ stotraiḥ paurāṇaiḥ prākṛtairapi|

stutvā prasīda bhagavanniti vandeta daṇḍavat|| 45

अर्थ

प्राचीन ऋषियोंके द्वारा अथवा प्राकृत भक्तोंके द्वारा बनाये हुए छोटे-बड़े स्तव और स्तोत्रोंसे मेरी स्तुति करके प्रार्थना करे—‘भगवन्! आप मुझपर प्रसन्‍न हों। मुझे अपने कृपाप्रसादसे सराबोर कर दें।’ तदनन्तर दण्डवत् प्रणाम करे॥ ४५॥

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