श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.46

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

शिरो मत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम्।

प्रपन्‍नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात्॥ ४६

śiro matpādayoḥ kṛtvā bāhubhyāṃ ca parasparam|

prapannaṃ pāhi māmīśa bhītaṃ mṛtyugrahārṇavāt|| 46

अर्थ

अपना सिर मेरे चरणोंपर रख दे और अपने दोनों हाथोंसे—दायेंसे दाहिना और बायेंसे बायाँ चरण पकड़कर कहे—‘भगवन्! इस संसार-सागरमें मैं डूब रहा हूँ। मृत्युरूप मगर मेरा पीछा कर रहा है। मैं डरकर आपकी शरणमें आया हूँ। प्रभो! आप मेरी रक्षा कीजिये’॥ ४६॥

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