जो अपनी दी हुई या दूसरोंकी दी हुई देवता और ब्राह्मणकी जीविका हरण कर लेता है, वह करोड़ों वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है॥ ५४॥✎ 1769
यः स्वदत्तां परैर्दत्तां हरेत सुरविप्रयोः।
वृत्तिं स जायते विड्भुग् वर्षाणामयुतायुतम्॥ ५४
जो अपनी दी हुई या दूसरोंकी दी हुई देवता और ब्राह्मणकी जीविका हरण कर लेता है, वह करोड़ों वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 882) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/27/54/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)