श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात्

पश्‍चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य।

तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं

नानापदेशैरहमस्य तद्वत्॥ १९

yathā hiraṇyaṃ svakṛtaṃ purastāt

paścācca sarvasya hiraṇmayasya|

tadeva madhye vyavahāryamāṇaṃ

nānāpadeśairahamasya tadvat|| 19

अर्थ

उद्धवजी! सोनेसे कंगन, कुण्डल आदि बहुत-से आभूषण बनते हैं; परन्तु जब वे गहने नहीं बने थे, तब भी सोना था और जब नहीं रहेंगे, तब भी सोना रहेगा। इसलिये जब बीचमें उसके कंगन-कुण्डल आदि अनेकों नाम रखकर व्यवहार करते हैं, तब भी वह सोना ही है। ठीक ऐसे ही जगत‍्का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ। वास्तवमें मैं ही सत्य तत्त्व हूँ॥ १९॥

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