॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.28.20
विज्ञानमेतत्त्रियवस्थमंग
गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ।
समन्वयेन व्यतिरेकतश्च
येनैव तुर्येण तदेव सत्यम्॥ २०
vijñānametattriyavasthamaṃga
guṇatrayaṃ kāraṇakāryakartṛ|
samanvayena vyatirekataśca
yenaiva turyeṇa tadeva satyam|| 20
अर्थ
भाई उद्धव! मनकी तीन अवस्थाएँ होती हैं—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति; इन अवस्थाओंके कारण तीन ही गुण हैं सत्त्व, रज और तम, और जगत्के तीन भेद हैं—अध्यात्म (इन्द्रियाँ), अधिभूत (पृथिव्यादि) और अधिदैव (कर्ता)। ये सभी त्रिविधताएँ जिसकी सत्तासे सत्यके समान प्रतीत होती हैं और समाधि आदिमें यह त्रिविधता न रहनेपर भी जिसकी सत्ता बनी रहती है, वह तुरीयतत्त्व—इन तीनोंसे परे और इनमें अनुगत चौथा ब्रह्मतत्त्व ही सत्य है॥ २०॥