श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति।

स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशतः॥ २

parasvabhāvakarmāṇi yaḥ praśaṃsati nindati|

sa āśu bhraśyate svārthādasatyabhiniveśataḥ|| 2

अर्थ

जो पुरुष दूसरोंके स्वभाव और उनके कर्मोंकी प्रशंसा अथवा निन्दा करते हैं, वे शीघ्र ही अपने यथार्थ परमार्थ-साधनसे च्युत हो जाते हैं; क्योंकि साधन तो द्वैतके अभिनिवेशका—उसके प्रति सत्यत्व-बुद्धिका निषेध करता है और प्रशंसा तथा निन्दा उसकी सत्यताके भ्रमको और भी दृढ़ करती हैं॥ २॥✎ 1770

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1770 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परमार्थ-दृष्टिसे → परमार्थदृष्टिसे

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