॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.28.1
अथाष्टाविंशोऽध्यायः
परमार्थनिरूपण
श्रीभगवानुवाच
परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च॥ १
parasvabhāvakarmāṇi na praśaṃsenna garhayet|
viśvamekātmakaṃ paśyan prakṛtyā puruṣeṇa ca|| 1
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! यद्यपि व्यवहारमें पुरुष और प्रकृति—द्रष्टा और दृश्यके भेदसे दो प्रकारका जगत् जान पड़ता है, तथापि परमार्थदृष्टिसे देखनेपर यह सब एक अधिष्ठान-स्वरूप ही है; इसलिये किसीके शान्त, घोर और मूढ़ स्वभाव तथा उनके अनुसार कर्मोंकी न स्तुति करनी चाहिये और न निन्दा। सर्वदा अद्वैत-दृष्टि रखनी चाहिये॥ १॥✎ 1770