श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि-

र्गुणो भवेन्मत्सुविविक्तधाम्‍नः।

विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणं

घनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम्॥ २५

samāhitaiḥ kaḥ karaṇairguṇātmabhi-

rguṇo bhavenmatsuviviktadhāmnaḥ|

vikṣipyamāṇairuta kiṃ nu dūṣaṇaṃ

ghanairupetairvigatai raveḥ kim|| 25

अर्थ

उद्धवजी! जिसे मेरे स्वरूपका भलीभाँति ज्ञान हो गया है, उसकी वृत्तियाँ और इन्द्रियाँ यदि समाहित रहती हैं तो उसे उनसे लाभ क्या है? और यदि वे विक्षिप्त रहती हैं तो उनसे हानि भी क्या है? क्योंकि अन्तःकरण और बाह्यकरण—सभी गुणमय हैं और आत्मासे इनका कोई सम्बन्ध नहीं है। भला, आकाशमें बादलोंके छा जाने अथवा तितर-बितर हो जानेसे सूर्यका क्या बनता-बिगड़ता है?॥ २५॥

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