श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै-

र्गतागतैर्वर्तुगुणैर्न सज्जते।

तथाक्षरं सत्त्वरजस्तमोमलै-

रहंमतेः संसृतिहेतुभिः परम्॥ २६

yathā nabho vāyvanalāmbubhūguṇai-

rgatāgatairvartuguṇairna sajjate|

tathākṣaraṃ sattvarajastamomalai-

rahaṃmateḥ saṃsṛtihetubhiḥ param|| 26

अर्थ

जैसे वायु आकाशको सुखा नहीं सकती, आग जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता, धूल-धुएँ मटमैला नहीं कर सकते और ऋतुओंके गुण गरमी-सर्दी आदि उसे प्रभावित नहीं कर सकते—क्योंकि ये सब आने-जानेवाले क्षणिक भाव हैं और आकाश इन सबका एकरस अधिष्ठान है—वैसे ही सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी वृत्तियाँ तथा कर्म अविनाशी आत्माका स्पर्श नहीं कर पाते; वह तो इनसे सर्वथा परे है। इनके द्वारा तो केवल वही संसारमें भटकता है जो इनमें अहंकार कर बैठता है॥ २६॥

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