श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम्।

न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत्॥ ८

etad vidvān maduditaṃ jñānavijñānanaipuṇam|

na nindati na ca stauti loke carati sūryavat|| 8

अर्थ

उद्धवजी! तुमसे मैंने ज्ञान और विज्ञानकी उत्तम स्थितिका वर्णन किया है। जो पुरुष मेरे इन वचनोंका रहस्य जान लेता है वह न तो किसीकी प्रशंसा करता है और न निन्दा। वह जगत‍्में सूर्यके समान समभावसे विचरता रहता है॥ ८॥✎ 1770

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1770 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परमार्थ-दृष्टिसे → परमार्थदृष्टिसे

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