श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा।

आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसंगो विचरेदिह॥ ९

pratyakṣeṇānumānena nigamenātmasaṃvidā|

ādyantavadasajjñātvā niḥsaṃgo vicarediha|| 9

अर्थ

प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र और आत्मानुभूति आदि सभी प्रमाणोंसे यह सिद्ध है कि यह जगत् उत्पत्ति-विनाशशील होनेके कारण अनित्य एवं असत्य है। यह बात जानकर जगत‍्में असंगभावसे विचरना चाहिये॥ ९॥✎ 1770

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1770 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परमार्थ-दृष्टिसे → परमार्थदृष्टिसे

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