प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र और आत्मानुभूति आदि सभी प्रमाणोंसे यह सिद्ध है कि यह जगत् उत्पत्ति-विनाशशील होनेके कारण अनित्य एवं असत्य है। यह बात जानकर जगत्में असंगभावसे विचरना चाहिये॥ ९॥✎ 1770
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा।
आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसंगो विचरेदिह॥ ९
प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र और आत्मानुभूति आदि सभी प्रमाणोंसे यह सिद्ध है कि यह जगत् उत्पत्ति-विनाशशील होनेके कारण अनित्य एवं असत्य है। यह बात जानकर जगत्में असंगभावसे विचरना चाहिये॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.28.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 884) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/28/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)