श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अयं हि सर्वकल्पानां सध्रीचीनो मतो मम।

मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभिः॥ १९

ayaṃ hi sarvakalpānāṃ sadhrīcīno mato mama|

madbhāvaḥ sarvabhūteṣu manovākkāyavṛttibhiḥ|| 19

अर्थ

मेरी प्राप्तिके जितने साधन हैं, उनमें मैं तो सबसे श्रेष्ठ साधन यही समझता हूँ कि समस्त प्राणियों और पदार्थोंमें मन, वाणी और शरीरकी समस्त वृत्तियोंसे मेरी ही भावना की जाय॥ १९॥✎ 2001

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

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