श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

न ह्यंगोपक्रमे ध्वंसो मद्धर्मस्योद्धवाण्वपि।

मया व्यवसितः सम्यङ्निर्गुणत्वादनाशिषः॥ २०

na hyaṃgopakrame dhvaṃso maddharmasyoddhavāṇvapi|

mayā vyavasitaḥ samyaṅnirguṇatvādanāśiṣaḥ|| 20

अर्थ

उद्धवजी! यही मेरा अपना भागवत-धर्म है; इसको एक बार आरम्भ कर देनेके बाद फिर किसी प्रकारकी विघ्न-बाधासे इसमें रत्तीभर भी अन्तर नहीं पड़ता; क्योंकि यह धर्म निष्काम है और स्वयं मैंने ही इसे निर्गुण होनेके कारण सर्वोत्तम निश्‍चय किया है॥ २०॥✎ 2001

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

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