कमलनयन! आप जानते ही हैं कि अधिकांश योगी जब अपने मनको एकाग्र करने लगते हैं, तब वे बार-बार चेष्टा करनेपर भी सफल न होनेके कारण हार मान लेते हैं और उसे वशमें न कर पानेके कारण दुःखी हो जाते हैं॥ २॥
प्रायशः पुण्डरीकाक्ष युंजन्तो योगिनो मनः।
विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहकर्शिताः ॥ २
कमलनयन! आप जानते ही हैं कि अधिकांश योगी जब अपने मनको एकाग्र करने लगते हैं, तब वे बार-बार चेष्टा करनेपर भी सफल न होनेके कारण हार मान लेते हैं और उसे वशमें न कर पानेके कारण दुःखी हो जाते हैं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 891) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/29/2/