श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

भवभयमपहन्तुं ज्ञानविज्ञानसारं

निगमकृदुपजह्रे भृंगवद् वेदसारम्।✎ 1234

अमृतमुदधितश्‍चापाययद् भृत्यवर्गान्

पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोऽस्मि॥ ४९

bhavabhayamapahantuṃ jñānavijñānasāraṃ

nigamakṛdupajahre bhṛṃgavad vedasāram|

amṛtamudadhitaścāpāyayad bhṛtyavargān

puruṣamṛṣabhamādyaṃ kṛṣṇasaṃjñaṃ nato'smi|| 49

अर्थ

परीक्षित्! जैसे भौंरा विभिन्‍न पुष्पोंसे उनका सार-सार मधु संग्रह कर लेता है, वैसे ही स्वयं वेदोंको प्रकाशित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने भक्तोंको संसारसे मुक्त करनेके लिये यह ज्ञान और विज्ञानका सार निकाला है। उन्हींने जरा-रोगादि भयकी निवृत्तिके लिये क्षीरसमुद्रसे अमृत भी निकाला था तथा इन्हें क्रमशः अपने निवृत्तिमार्गी और प्रवृत्तिमार्गी भक्तोंको पिलाया, वे ही पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण सारे जगत‍्के मूल कारण हैं। मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ॥ ४९॥✎ 1772 1773

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः

॥ २९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1234 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निगमकृदुपजहृ → निगमकृदुपजह्रे
  • #1772 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्षीर-समुद्रसे → क्षीरसमुद्रसे
  • #1773 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: उपदेशा-नुसार → उपदेशानुसार

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