श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान् सुमंगलान्।

याञ्छ्रद्धयाऽऽचरन् मर्त्यो मृत्युं जयति दुर्जयम्॥ ८

hanta te kathayiṣyāmi mama dharmān sumaṃgalān|

yāñchraddhayā''caran martyo mṛtyuṃ jayati durjayam|| 8

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—प्रिय उद्धव! अब मैं तुम्हें अपने उन मंगलमय भागवतधर्मोंका उपदेश करता हूँ, जिनका श्रद्धापूर्वक आचरण करके मनुष्य संसाररूप दुर्जय मृत्युको अनायास ही जीत लेता है॥ ८॥✎ 2001

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

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