श्रीभगवान्ने कहा—प्रिय उद्धव! अब मैं तुम्हें अपने उन मंगलमय भागवतधर्मोंका उपदेश करता हूँ, जिनका श्रद्धापूर्वक आचरण करके मनुष्य संसाररूप दुर्जय मृत्युको अनायास ही जीत लेता है॥ ८॥✎ 2001
हन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान् सुमंगलान्।
याञ्छ्रद्धयाऽऽचरन् मर्त्यो मृत्युं जयति दुर्जयम्॥ ८
श्रीभगवान्ने कहा—प्रिय उद्धव! अब मैं तुम्हें अपने उन मंगलमय भागवतधर्मोंका उपदेश करता हूँ, जिनका श्रद्धापूर्वक आचरण करके मनुष्य संसाररूप दुर्जय मृत्युको अनायास ही जीत लेता है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 892) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/29/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-