श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः।

अमाययानुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः॥ २२

tatra bhāgavatān dharmān śikṣed gurvātmadaivataḥ|

amāyayānuvṛttyā yaistuṣyedātmā''tmado hariḥ|| 22

अर्थ

जिज्ञासुको चाहिये कि गुरुको ही अपना परम प्रियतम आत्मा और इष्टदेव माने। उनकी निष्कपटभावसे सेवा करे और उनके पास रहकर भागवतधर्मकी—भगवान्‌को प्राप्त करानेवाले भक्ति-भावके साधनोंकी क्रियात्मक शिक्षा ग्रहण करे। इन्हीं साधनोंसे सर्वात्मा एवं भक्तको अपने आत्माका दान करनेवाले भगवान् प्रसन्‍न होते हैं॥ २२॥

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