श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु।

दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३

sarvato manaso'saṃgamādau saṃgaṃ ca sādhuṣu|

dayāṃ maitrīṃ praśrayaṃ ca bhūteṣvaddhā yathocitam|| 23

अर्थ

पहले शरीर, सन्तान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखे। फिर भगवान्‌के भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिये—यह सीखे। इसके पश्‍चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करे॥ २३॥

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