श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

राजोवाच

नारायणाभिधानस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।

निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमाः॥ ३४

nārāyaṇābhidhānasya brahmaṇaḥ paramātmanaḥ|

niṣṭhāmarhatha no vaktuṃ yūyaṃ hi brahmavittamāḥ|| 34

अर्थ

राजा निमिने पूछा—महर्षियो! आपलोग परमात्माका वास्तविक स्वरूप जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये मुझे यह बतलाइये कि जिस परब्रह्म परमात्माका ‘नारायण’ नामसे वर्णन किया जाता है, उनका स्वरूप क्या है?॥ ३४॥

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