॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.3.41
राजोवाच
कर्मयोगं वदत नः पुरुषो येन संस्कृतः।
विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम्॥ ४१
karmayogaṃ vadata naḥ puruṣo yena saṃskṛtaḥ|
vidhūyehāśu karmāṇi naiṣkarmyaṃ vindate param|| 41
अर्थ
राजा निमिने पूछा—योगीश्वरो! अब आपलोग हमें कर्मयोगका उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा शुद्ध होकर मनुष्य शीघ्रातिशीघ्र परम नैष्कर्म्य अर्थात् कर्तृत्व, कर्म और कर्मफलकी निवृत्ति करनेवाला ज्ञान प्राप्त करता है॥ ४१॥