श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.50

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकैः।

द्रव्यक्षित्यात्मलिंगानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम्॥ ५०

arcādau hṛdaye cāpi yathālabdhopacārakaiḥ|

dravyakṣityātmaliṃgāni niṣpādya prokṣya cāsanam|| 50

अर्थ

पहले पुष्प आदि पदार्थोंका जन्तु आदि निकालकर, पृथ्वीको सम्मार्जन आदिसे, अपनेको अव्यग्र होकर और भगवान्‌की मूर्तिको पहलेहीकी पूजाके लगे हुए पदार्थोंके क्षालन आदिसे पूजाके योग्य बनाकर फिर आसनपर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जल छिड़ककर पाद्य, अर्घ्य आदि पात्रोंको स्थापित करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर हृदयमें भगवान्‌का ध्यान करके फिर उसे सामनेकी श्रीमूर्तिमें चिन्तन करे। तदनन्तर हृदय, सिर, शिखा (हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा) इत्यादि मन्त्रोंसे न्यास करे और अपने इष्टदेवके मूलमन्त्रके द्वारा देश, काल आदिके अनुकूल प्राप्त पूजा-सामग्रीसे प्रतिमा आदिमें अथवा हृदयमें भगवान्‌की पूजा करे॥ ५०-५१॥

यह व्याख्या श्लोक 11.3.50 से 11.3.51 तककी एक साथ है।

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