श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.54

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः।

शेषामाधाय शिरसि स्वधाम्‍न्युद्वास्य सत्कृतम्॥ ५४✎ 2143

ātmānaṃ tanmayaṃ dhyāyan mūrtiṃ sampūjayeddhareḥ|

śeṣāmādhāya śirasi svadhāmnyudvāsya satkṛtam|| 54

अर्थ

अपने-आपको भगवन्मय ध्यान करते हुए ही भगवान्‌की मूर्तिका पूजन करना चाहिये। निर्माल्यको अपने सिरपर रखे और आदरके साथ भगवद्विग्रहको यथास्थान स्थापित कर पूजा समाप्त करनी चाहिये॥ ५४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2143 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): धाम्‍नॺुद्वा → धाम्‍न्युद्वा

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें