श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

ततस्तस्मिन् महापानं पपुर्मैरेयकं मधु।✎ 1845

दिष्टविभ्रंशितधियो यद‍्द्रवैर्भ्रश्यते मतिः॥ १२

tatastasmin mahāpānaṃ papurmaireyakaṃ madhu|

diṣṭavibhraṃśitadhiyo yaddravairbhraśyate matiḥ|| 12

अर्थ

यह सब तो उन्होंने किया; परन्तु दैवने उनकी बुद्धि हर ली और वे उस मैरेयक नामक मदिराका पान करने लगे, जिसके नशेसे बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। वह पीनेमें तो अवश्य मीठी लगती है, परन्तु परिणाममें सर्वनाश करनेवाली है॥ १२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1845 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): पपु: मैरेयकं → पपुर्मैरेयकं

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