श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः।

प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत्॥ २

brahmaśāpopasaṃsṛṣṭe svakule yādavarṣabhaḥ|

preyasīṃ sarvanetrāṇāṃ tanuṃ sa kathamatyajat|| 2

अर्थ

प्रभो! यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने अपने कुलके ब्रह्मशापग्रस्त होनेपर सबके नेत्रादि इन्द्रियोंके परम प्रिय अपने दिव्य श्रीविग्रहकी लीलाका संवरण कैसे किया?॥ २॥

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