॥ श्रीहरिः ॥
ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः।
प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत्॥ २
brahmaśāpopasaṃsṛṣṭe svakule yādavarṣabhaḥ|
preyasīṃ sarvanetrāṇāṃ tanuṃ sa kathamatyajat|| 2
अर्थ
प्रभो! यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने अपने कुलके ब्रह्मशापग्रस्त होनेपर सबके नेत्रादि इन्द्रियोंके परम प्रिय अपने दिव्य श्रीविग्रहकी लीलाका संवरण कैसे किया?॥ २॥
ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः।
प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत्॥ २
प्रभो! यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने अपने कुलके ब्रह्मशापग्रस्त होनेपर सबके नेत्रादि इन्द्रियोंके परम प्रिय अपने दिव्य श्रीविग्रहकी लीलाका संवरण कैसे किया?॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 897) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/30/2/