भगवान् श्रीकृष्णने उस समय अपनी अंगकान्तिसे देदीप्यमान चतुर्भुज रूप धारण कर रखा था और धूमसे रहित अग्निके समान दिशाओंको अन्धकाररहित—प्रकाशमान बना रहे थे॥ २८॥✎ 1774
बिभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।
दिशो वितिमिराः कुर्वन् विधूम इव पावकः॥ २८
भगवान् श्रीकृष्णने उस समय अपनी अंगकान्तिसे देदीप्यमान चतुर्भुज रूप धारण कर रखा था और धूमसे रहित अग्निके समान दिशाओंको अन्धकाररहित—प्रकाशमान बना रहे थे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 900) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)