श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकिरीटकटकांगदैः ।

हारनूपुरमुद्राभिः कौस्तुभेन विराजितम्॥ ३१

kaṭisūtrabrahmasūtrakirīṭakaṭakāṃgadaiḥ |

hāranūpuramudrābhiḥ kaustubhena virājitam|| 31

अर्थ

कमरमें करधनी, कंधेपर यज्ञोपवीत, माथेपर मुकुट, कलाइयोंमें कंगन, बाँहोंमें बाजूबंद, वक्षःस्थलपर हार, चरणोंमें नूपुर, अँगुलियोंमें अँगूठियाँ और गलेमें कौस्तुभमणि शोभायमान हो रही थी॥ ३१॥✎ 1774

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1774 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: एकाग्र-चित्तसे → एकाग्रचित्तसे

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