॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.30.32
वनमालापरीतांगं मूर्तिमद्भिर्निजायुधैः।
कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पंकजारुणम्॥ ३२
vanamālāparītāṃgaṃ mūrtimadbhirnijāyudhaiḥ|
kṛtvorau dakṣiṇe pādamāsīnaṃ paṃkajāruṇam|| 32
अर्थ
घुटनोंतक वनमाला लटकी हुई थी। शंख, चक्र, गदा आदि आयुध मूर्तिमान् होकर प्रभुकी सेवा कर रहे थे। उस समय भगवान् अपनी दाहिनी जाँघपर बायाँ चरण रखकर बैठे हुए थे, लाल-लाल तलवा रक्त कमलके समान चमक रहा था॥ ३२॥✎ 1774