॥ श्रीहरिः ॥
गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथः।
संकर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मद्दशाम्॥ ४६
gaccha dvāravatīṃ sūta jñātīnāṃ nidhanaṃ mithaḥ|
saṃkarṣaṇasya niryāṇaṃ bandhubhyo brūhi maddaśām|| 46
अर्थ
‘दारुक! अब तुम द्वारका चले जाओ और वहाँ यदुवंशियोंके पारस्परिक संहार, भैया बलरामजीकी परम गति और मेरे स्वधाम-गमनकी बात कहो’॥ ४६॥✎ 907 1775
गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथः।
संकर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मद्दशाम्॥ ४६
‘दारुक! अब तुम द्वारका चले जाओ और वहाँ यदुवंशियोंके पारस्परिक संहार, भैया बलरामजीकी परम गति और मेरे स्वधाम-गमनकी बात कहो’॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 902) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #907 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्से
- #1775 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गरुड़-ध्वज → गरुड़ध्वज