इधर दारुक भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल होकर द्वारका आया और वसुदेवजी तथा उग्रसेनके चरणोंपर गिर-गिरकर उन्हें आँसुओंसे भिगोने लगा॥ १५॥✎ 17761777
दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः।
पतित्वा चरणावस्रैर्न्यषिंचत् कृष्णविच्युतः॥ १५
इधर दारुक भगवान् श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल होकर द्वारका आया और वसुदेवजी तथा उग्रसेनके चरणोंपर गिर-गिरकर उन्हें आँसुओंसे भिगोने लगा॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.31.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 905) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/31/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)