श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिनः।

उर्वशीमप्सरःश्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवं ययुः॥ १५

omityādeśamādāya natvā taṃ suravandinaḥ|

urvaśīmapsaraḥśreṣṭhāṃ puraskṛtya divaṃ yayuḥ|| 15

अर्थ

देवराज इन्द्रके अनुचरोंने ‘जो आज्ञा’ कहकर भगवान्‌के आदेशको स्वीकार किया तथा उन्हें नमस्कार किया। फिर उनके द्वारा बनायी हुई स्त्रियोंमेंसे श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशीको आगे करके वे स्वर्गलोकमें गये॥ १५॥✎ 1728

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1728 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वर्ग-लोककी → स्वर्गलोककी

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