श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्‍वरम्।

मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः॥ १५

dviṣantaḥ parakāyeṣu svātmānaṃ harimīśvaram|

mṛtake sānubandhe'smin baddhasnehāḥ patantyadhaḥ|| 15

अर्थ

यह शरीर मृतक-शरीर है। इसके सम्बन्धी भी इसके साथ ही छूट जाते हैं। जो लोग इस शरीरसे तो प्रेमकी गाँठ बाँध लेते हैं और दूसरे शरीरोंमें रहनेवाले अपने ही आत्मा एवं सर्वशक्तिमान् भगवान्‌से द्वेष करते हैं, उन मूर्खोंका अधःपतन निश्‍चित है॥ १५॥✎ 902 1732 1733

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #902 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1732 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काल-भगवान् → कालभगवान्
  • #1733 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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