हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः॥ २४
tretāyāṃ raktavarṇo'sau caturbāhustrimekhalaḥ|
hiraṇyakeśastrayyātmā sruksruvādyupalakṣaṇaḥ|| 24
अर्थ
राजन्! त्रेतायुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रंग होता है लाल। चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं॥ २४॥
त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः।
हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः॥ २४
राजन्! त्रेतायुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रंग होता है लाल। चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 740) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/5/24/