श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तं तदा मनुजा देवं सर्वदेवमयं हरिम्।

यजन्ति विद्यया त्रय्या धर्मिष्ठा ब्रह्मवादिनः॥ २५

taṃ tadā manujā devaṃ sarvadevamayaṃ harim|

yajanti vidyayā trayyā dharmiṣṭhā brahmavādinaḥ|| 25

अर्थ

उस युगके मनुष्य अपने धर्ममें बड़ी निष्ठा रखनेवाले और वेदोंके अध्ययन-अध्यापनमें बड़े प्रवीण होते हैं। वे लोग ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदरूप वेदत्रयीके द्वारा सर्वदेवस्वरूप देवाधिदेव भगवान् श्रीहरिकी आराधना करते हैं॥ २५॥

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