श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

विष्णुर्यज्ञः पृश्‍निगर्भः सर्वदेव उरुक्रमः।

वृषाकपिर्जयन्तश्‍च उरुगाय इतीर्यते॥ २६

viṣṇuryajñaḥ pṛśnigarbhaḥ sarvadeva urukramaḥ|

vṛṣākapirjayantaśca urugāya itīryate|| 26

अर्थ

त्रेतायुगमें अधिकांश लोग विष्णु, यज्ञ, पृष्निगर्भ, सर्वदेव, उरुक्रम, वृषाकपि, जयन्त और उरुगाय आदि नामोंसे उनके गुण और लीला आदिका कीर्तन करते है॥ २६॥

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